Sunday, 29 April 2018

Satyendra Kumar ki Motivational Poem

मंजिले￰ सब तक रहे थे अपनी अपनी राह में
मै अकेला उड़  रहा था आसमा की  चाह में

सारी दुनिया कह रही थी तू अकेला चल न सकता
काटुओं की इस गुफा  में तू अकेला पल न सकता
मेरे उड़ने के हुनर को शायद वो माने नहीं थे
मै हौसलों से भरा से भरा हूँ शायद वो जाने नहीं थे
वक्त गुजरा जा रहा था इंसां भी घवरा   रहा था
बिजलियाँ सब बुझ  रही थीं बस दिया  एक जल रहा था
मै भी बढ़ता जा रहा  था -2 उस  दिये की राह में
मै अकेला  उड़ रहा था  आसमा की चाह में.......

ज़िंदगी बढ़ती रहेगी कारवां चलता रहेगा
धरती ठंडी ही रहेगी आसमां जलता रहेगा
इस सफर के बाद मेरा दुनिया को पैग़ाम होगा
ऐसे ही चलते रहेंगे आगे जो अंजाम होगा
इस जहां से दूर हटकर  तेरी भी एक शान होगी
 गर न रुके  तेरे कदम  तो तेरी भी पहचान होगी
ज़िन्दगी छोटी पड़ रही थी -2 उस कारवां  की बांह  में
मै अकेला उड़ रहा था आसमां की चाह में........

गर रुक गये तेरे क़दम तो आओगे तुम हास में
गर न रुके तेरे क़दम तो छाआगे इतिहास में
हास या इतिहास बनना सब है तेरे हाथ में
रास्ता तू खुद चलेगा कोई न होगा साथ में
इस रण-ए-भूमि में गर तीर बनकर जायेगा
पूजा जायेगा धरा पे गर वीर बनकर जायेगा
ध्रुब की तरह तू भी चमकेगा-2 आसमां की बांह में
मै अकेला उड़ रहा था आसमा की चाह में.......

मंजिले￰ सब तक रहे थे अपनी-अपनी राह में
मै अकेला उड़  रहा था आसमा की  चाह में...

First

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